किसी भी दौर में प्रचलित कला एवं संस्कृति उस दौर के लोगों की मानसिकता को दर्शाती है. आज लोगों की सोच में शार्टकट व यूज़ एंड थ्रो का फंडा है जिसमे नैतिक मूल्यों के लिये कोई जगह नहीं.अगर कहीं कुछ हैं भी तो व्यक्तिगत नुक़सान और नफे़ के बोझ तले दबा हुआ.
आपाधापी के इस युग में किसको फुरसत है कि वो नैतिक मूल्यों का पालन करे और अपनी संतान मे भी इसे रोपे? परिणाम हमारे सामने है. भौतिक प्रतिस्पर्धा से उपजा नैतिक मूल्यों का ह्रास मुन्नी और शीला की जवानी दिखाकर हर रोज़ पतन के गर्त में और गहरे ढकेल रहा है.....
हम पश्चिमी सभ्यता का अंधानुकरण कर रहे हैं.हम अपनी अत्यंत शालीन भारतीय सभ्यता को भूलकर अंग्रेज़ जैसा दिखने की होड़ में लगे हैं नये दौर में जिन्हें फिल्मी गीत कहा जा रहा है, उनमें गीत की शब्द योजना है ही नही .गद्य में फूहड़ संवाद केवल तेज धुनों के सहारे गाये जा रहे हैं और इन्हें नया गाना माना जाता है.
इस तरह के अश्लील गानों ने निश्चय ही गीतों की रूह को निचोड़ कर मार दिया है..
इस तरह के अश्लील गानों ने निश्चय ही गीतों की रूह को निचोड़ कर मार दिया है..
हमारा दौर ग़लत मनसिकता को जल्द अपना लेता है पर यही दौर वास्तविक सकारात्मक परिवर्तन भी लाता रहा है। और हर पाँच मेँ से दो फिल्मेँ सकारात्मक सोच के साथ बनती और सफल भी हो रही है, पर इन गिने चुने नामों को सामने लाकर हम कबतक वास्तविकताओं से छिपते रहें.....।