हम अपने दुःख में और सुख में खोए रहते हैं. न तो मां का आँचल याद रहता है और न ही उन गांठों को खोलकर मां का वो चवन्नी अठन्नी देना.
याद नहीं रहती तो वो मां की थपकियां. चोट लगने पर मां की आंखों से झर झर बहते आंसू. शहर से लौटने पर बिना पूछे वही बनाना जो पसंद हो. जाते समय लाई, चूड़ा, बादाम और न जाने कितनी पोटलियों में अपनी यादें निचोड़ कर डाल देना.
हमारे पास उन्हें देने के लिए कुछ नहीं है. हमारे बटुओं में सिर्फ़ झूठ है. गुस्सा है...अवसाद है... अपना बनावटी चिड़चिडापन है. उनकी गांठों में आज भी सुख है दुःख है और हम खोलने जाएं तो हमारे लिए आशीर्वाद के अलावा और कुछ नहीं.
बचपन में हमने न जाने कैसे कैसे सवाल किए होंगे लेकिन आज क्यों हमें उनके सवाल बुरे लगते हैं ...., आंखे नम हैं और बस आंसू बहे जा रहे हैं, भूख मर सी गई, आंखों के सामने सिर्फ और सिर्फ मा-पिताजी का चेहरा दिख रहा है.
आखिर कैसे हम दुनिया के बनावटी चीज़ों में गुम होते जा रहे हैं, रिश्ते अपनी शर्तों पर चाहते हैं, हकीकत से ज्यादा ख्वाबों में रहना चाहते हैं हम ... प्यार करते हैं लेकिन इस प्यार को वक्त पर जताना नहीं जानते और यही सबसे बड़ी कमी है हमारी...
हम कभी नहीं भूल सकते उन ममता मयी हाथों को जिसने हमारे जीवन को करीने से सजाया संवारा है और उर्जावान बनाया है...
आएये सब मिलकर सपथ लेते हैं.. उनके चरणों को नमन करके ही अपने हर दिन की शुरुआत करें हम. :)
~ दीपक शांडिल्य
Thursday, 9 February 2012
हम अपने दुःख में और सुख में खोए रहते हैं. न तो मां का आँचल याद रहता है और न ही मां की वो थपकियां...
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